यथावत, शब्दों की गरिमा रखो

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यथावत, शब्दों की गरिमा रखो।
बोलो उतना ही, जितने तोल सको।
मिश्री अनुभव के रस घोल सको।
निर्मलता, जीवन के तथ्यों का खोल सको।
जीवन कभी-कभी तो पढ लो नीति के पाठ।
जीवन पथ पर चलने को, थामो धैर्य का हाथ।।

तिक्त-विषाक्त उन वाक्यों का प्रयोग।
तेरे जीवंत भाव को निराधार कर देगा।
तुम संभल सको जब तक, प्रहार कर देगा।
तुम मानो तो, यह कलुषित विचार कर देगा।
जीवन उर्मित उपवन है, अभी भी कर लो ज्ञात।
जीवन पथ पर चलने को थामो धैर्य का हाथ।

सूनसान-बियाबान जंगल सारा जग है, देखो।
बातें अघोषित सत्य, निराधार मत समझो।
आकर्षण है इसमें, व्यर्थ बात मत समझो।
आत्म-वंचना करना उचित बात मत समझो।
सत्य बोध करने को हो तत्पर, नियम तुम्हें हो ज्ञात।
जीवन पथ पर चलने को थामो धैर्य का हाथ।।

तुम उत्तर दाई बनने को उत्सुक मत हो जाना।
शब्दों की माया अति कुटिल है, घात करेगा।
लौटेगा अति विषाक्त हो, विष सौगात में देगा।
जो संभलोगे तनिक, फिर से वही हालात करेगा।
अनुशासन जीवन के उप बंधो का, इससे बनेगी बात।
जीवन पथ पर चलने को थामो धैर्य का हाथ।।

यथावत शब्दों की गरिमा रखने का पुरुषार्थ।
तुम मानव बन जाओ, करने का नियम बना लो।
आत्म-वंचना का लोभ, हृदय में तनिक न पालो।
हो जीवन पथ के पथिक, हृदय को बोध करा लो।
व्यवहार उचित करने को, जीवन से ले-लो ज्ञान सौगात।
जीवन पथ पर चलने को थामो धैर्य का हाथ।।

– मदन मोहन ‘मैत्रेय’


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