अगर आप ईमानदार है तो…

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क्या आप ईमानदार है? क्या आप अच्छी साख रखते है फिर भी उसका उपयोग नही करते? फिर तो आप हमारे देश के सरकारी विभागो मे कार्यरत अधिकारियो और कर्मचारियो की नजरो मे फेल हो और घटिया किस्म के नागरिक हो क्योकि आप किसी भी सरकारी कर्मचारी का भला नही कर सकते।

मतलब कि आप अपनी ईमानदारी से रिश्वत के भुखे और भ्रष्ट सरकारी अधिकारी व उनके नीचे कार्यरत कर्मचारियो की ऊपरी कमाई पर लात मार रहे है जो इनको सरासर गलत लगती है।

इन सरकारी विभागो के कर्मचारियो व अधिकारियो की आपको हाय भी लग सकती है। इसके अलावा आपके साथ अन्य हादसे भी हो सकते है। जैसे इनके विभाग मे जाने पर आपको कोई तरजीह नही दी जायेगी, आपको व्यस्त होने का बहाना दे दिया जायेगा और अपने कार्य के लिये महिनो वर्षो तक अपनी कई चप्पले तोडनी पड़ सकती है।

अगर आप तब भी बाज नही आये तो आपकी फाईल मे कोई कमी पर कमी निकाल कर आपको चक्कर कटा-कटाकर आपकी जिन्दगी का चैन छीन लेगे। भई करे भी क्यो नही, आप जैसे लोग इनकी ऊपरी कमाई खत्म जो कर रहे है। अगर आप जैसे लोग हमारे समाज मे हर जगह मिल जाये तो ये तो अपनी सरकारी नौकरी ही छोड देगे और दल्लागिरी करने लगेगे क्योकि इन्हे कई वर्षो का अनुभव जो है।

भईया इन्हे तो हराम का मुंह लगा हुआ है, इनका तो सरकारी वेतन से खर्च चलता ही नही। क्या करे इनके खर्चे भी तो शाही है जैसे मंहगी शराब पीना, थ्री स्टार होटल मे डिनर करना, गाड़ी के पट्रोल का खर्च, बच्चो के खर्चे इत्यादि अनेको खर्चे है और आप है कि आप इमानदारी का चोला ओढे बैठे हो। क्या कभी इन सरकारी कर्मचारियो की जीवन शैली और उनका सेवा भाव देखा है। नही देखा है इसलिये तो आप ईमानदार है।

एक बार इनको रिश्वत तो दो तब पता चल जायेगा आपको कि ये रिश्वत देने वाले की कितनी सेवा करते है और उसके कार्य को प्रमुखता से करते है वो भी बिना समय बर्बाद किये। कुत्ते भी इनकी वफादारी से जलने लग जाये।

हमे ही देखिये हम रिश्वत के खिलाफ है तो हमारी फाईल पिछले लगभग आठ महिनो से मेरठ के सूचना विभाग मे मुर्दों की तरह दबी है और हमारे एक जानकार ने सूचना विभाग मे रिश्वत के साथ अपनी फाईल हमारे पांच महिने बाद दी तो उनका पूरा सम्मान किया गया जैसे एक वी.आई.पी. का किया जाता है।

उनके विभाग जाने पर उन्हे सैल्यूट ठोका जाता है। इसलिये हम तो कहते है भईया ये सरकारी कर्मचारी है इनसे बिगाड़ के चलागे तो तुम्हारा काम भी ठण्डे बस्ते मे चला जायेगा और बिना पर वाली चिड़िया की कल्पना करते रहो कि हमारा कार्य कभी तो पूर्ण होगा ।

भ्रष्टाचार की जय हो। भ्रष्टाचार अमर रहे। सरकारी भ्रष्ट अधिकारी व कर्मचारी जिन्दाबाद।

(लेखक की ओर से – यह व्यंग्य मेरे द्वारा वर्ष 2011 की शुरूवात में लिखा गया था, जब मैं अपनी एक पत्रिका के पंजीकरण के लिए सूचना विभाग में चक्कर काट रहा था। उन्हीं दिनों के खराब अनुभव ने लिखने के लिए प्रेरित किया।)

लेखक : राजेन्द्र सिंह बिष्ट

(लेखक कई वर्षों तक पत्रकारिता में रहने के बाद अब प्रकाशन व्यवसाय में हैं)

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