ना जाने कौन सी खिड़की खुली थी (एक दुखांतक संस्मरण / लघुकथा)

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Prachi

अमूमन सुबह थोडी जल्दी नींद खुल जाती है पर उस दिन छुट्टी थी इसलिये सुबह थोडी देर से सोकर उठे। बालकनी मे आये तो देखा आसमान मे काले बादल छाये थे और बहुत अच्छी हवा भी चल रही थी। हल्की बरसात के आसार थे। मौसम बहुत ही खुशनुमा था तो सोचा छत पर चलकर मौसम का आनन्द लिया जाय।

छत पर जाने के लिये अभी दो-तीन सीढिया ही चढ़े थे कि अगली सीढियों पर अजब ही मंजर दिखा। देखकर मन विचलित हो गया और पांव अपने आप ठिठक कर रुक गये , आगे जाने की हिम्मत नही पड़ी। मौसम का आनन्द लेने की बात तो ना जाने कहां काफूर हो गयी। मन कुछ महीने पहले की बातों को सोचने पर विवश हो गया।

अभी कुछ महीनो पहले की ही तो बात है। मैं छत पर बैठा था। मैने देखा कि कबूतरों का एक जोड़ा चोंच मे कुछ पतले सूखे डंठल लिये आता हैं और छत पर जीने के पास बने अलमारी के ऊपरी हिस्से मे लाकर रख देता हैं। यही प्रक्रिया दिन भर चलता रहता है। समझ मे आ गया कि उसे किसी सुरक्षित जगह की तलाश है अपने नये घोंसले के लिये।

कबूतरों के बारे मे ऐसा कहा जाता है कि उन्हे घोंसला बनाना नही आता। जिस तरह अन्य पक्षी अपने लिये बहुत सुन्दर और विभिन्न तरह के घोंसले बना लेते हैं कबूतर ऐसा नही कर पाते , इसीलिये शायद कबूतरों के घोंसले किसी पेड़ पर नही पाये जाते क्योंकि पेड़ के डालियों और टहनियों की उन्हे अच्छी परख नही रहती और ऐसे घोंसले नही बना पाते जिसमे उनके अंडे सुरक्षित रहें और गिर कर टूटने ना पायें। इसीलिये कबूतर प्राय: अपने घोंसले घरों के झरोखों, ताखों या अलमारियों पर बना लेते हैं जिससे वो मजबूत सतह पा जाएं और उनके अंडे गिर कर ना टूट जाय।

अपने लिये घोंसला वो सुरक्षित जगह ही बनाते होंगे पर इस बार कुछ ज्यादा ही सुरक्षा की जरूरत होगी। किसलिए इतनी सुरक्षा की तलाश थी इसका आभास भी मुझे हो गया। मैने भी कोई रुकावट नही पैदा की और पूरी प्रक्रिया देखता रहा घोंसला बनने की। थोड़े ही दिनो मे एक मजबूत पर बेतरतीब सा घोंसला तैयार हो गया। कबूतरों के घोंसले मजबूत पर सामान्य ही होते हैं। घोंसला केवल निचले तल का ही था ऊपर से पूरा खुला हुआ पर मजबूती मे कोई कमी नही लग रही थी। घोसले का सम्पूर्ण रूप देखते ही तारीफ करने को जी चाहा पर भाषा आड़े आ गयी।

अक्सर मैं देखता दोनो को उसी घोंसले पर बैठे हुये । मैं उन्हे देखता , वो भी मुझे देखते पर थोड़ा डरे और सहमे से। एक बार मैने यूं ही घोंसले को छूने की कोशिस की तो डर कर सहम गये। मैने भी हाथ पीछे खींच लिया। छत पर अक्सर आना जाना होता था और आते जाते मैं उनकी तरफ देख भी लेता था तो शायद उन दोनो की आंखों मे मेरी पहचान बन गयी और धीरे धीरे उनका डर खत्म हो गया। उन्हे मुझसे कोई डर नही दिखा। एक दिन यूं ही एक बार फिर मैने अपना हाथ बढाया उनकी तरफ तो इस बार वो नही डरे। मैने भी उन पर हल्का सा हाथ फेरकर अपना हाथ हटा लिया। शायद सुकून की अनुभूति दोनो तरफ थी, ऐसा मुझे आभास हुआ।

कुछ दिन बाद मैने देखा दोनो किसी चीज को घेरकर बैठे हैं , शायद इस प्रयास मे हों कि कोई उस चीज को देख ना ले। मुझे थोडी उत्सुकता हुई तो थोड़ा उचक कर देखा। दोनो ने अपने शरीर और पंखों से दो या तीन अंडों को छिपा रखा था। मैने भी उन्हे परेशान नही किया, चुपचाप वहां से चला आया।

फिर कुछ दिन बाद वो समय भी आया जिसका उन दोनो को इन्तजार रहा होगा। मैने देखा दो छोटे छोटे बच्चे चीं-चीं , चीं-चीं की आवाज कर रहे थे। दोनो अपने अपने चोंचों से बच्चों के मुह मे कुछ दाने डाल रहे थे। मैने भी कुछ अनाज के दाने और एक कटोरी मे कुछ पानी वहीं रख दिया। बच्चे अभी बहुत ही छोटे और कमजोर थे इसलिये उन्हे छूने की जिज्ञासा को मैने अपने मन मे ही शान्त कर लिया। मैने सोचा की उनके व्यक्तिगत जीवन मे ज्यादा व्यवधान ना डाला जाय इसलिये आते जाते देख तो लेता था पर रुक कर उन पर नजर रखना, ध्यान से देखना या छूना उचित नही लगा।

समय बीतता रहा। पूरे परिवार को उन कबूतर के जोड़ों और उनके बच्चों से लगाव हो चुका था। धीरे धीरे बच्चे बड़े हो रहे थे। उनके पंख बड़े हो रहे थे। पंखों पर काला सफेद मिश्रित रंग भी आने लगा था। सब कुछ सामान्य चल रहा था। बच्चों के पंख मजबूत हुए। फिर कुछ और दिन बीते और एक दिन बच्चों को उड़ना भी आ गया।

आज छत पर जाते समय और पूरा मंजर देख कुछ दिंन पहले की ये पूरी बात मेरे दिमाग मे कुछ पल के घूम गयी। मन पूरी तरह से विचलित हो चुका था। मौसम का आनन्द लेने की बात तो जाने कहां चली गयी।

अगली सीढ़ी पर ही कबूतरों का एक बच्चा खून से लथ-पथ मृत पड़ा था। बिखरे और टूटे हुये पंख एक भीषण संघर्ष का संकेत दे रहे थे जो उसने जान बचाने के लिये किया होगा। थोडा और ऊपर चढ़ा तो सन्न रह गया। कबूतरों का दूसरा बच्चा भी बिल्कुल उसी हालत मे मृत पड़ा था। आस-पास खून बिखरा हुआ था। दुखी मन से थोडा और आगे बढा तो आंखों मे आंसू आ गये। जोड़ों मे से एक सदस्य शायद कबूतरी थी, अलमारी के ठीक नीचे फर्श पर खून से लथ-पथ मृत पड़ी थी। यहां भी टूटे और बिखरे पंख एक संघर्ष की गाथा लिख रहे थे जो उसने खुद के और बच्चों की जान बचाने के लिए किया होगा।

बहुत ही हिम्मत करके मैने अपनी नजर धीरे धीरे ऊपर घोंसले की तरफ उठायी तो चकित रह गया। उस कबूतर परिवार का मुख्य सदस्य कबूतर घोंसले के पास ही खून से सना हुआ लेकिन जीवित अवस्था मे एक टक नीचे पड़े हुये मृत सदस्यों को बदहवास निहारे जा रहा था। उसके भी बिखरे पंख एक भीषण संघर्ष की गवाही दे रहे रहे थे जो उसे अपने कुनबे को बचाने के लिये किया होगा। कल्पना से परे थी उसकी पूरी मनोदशा।

थोड़ा नजर इधर-उधर दौड़ाया तो पास मे ही बिल्ली के कुछ बाल मिले। फिर तो पूरी घटना का आभास हो गया। वैसे तो बिल्लियों का आना जाना घर मे कम ही होता है पर शायद रात मे किसी रास्ते कोई बिल्ली आयी होगी। यह भी सम्भव है कि कई दिनो से वो मौके की ताक मे रही हो। देर रात घर मे सभी सो गये तो वो आयी हो और पूरे घटनाक्रम को अंजाम दिया हो। अच्छा खासा संघर्ष हुआ हो। पर ताकतवर बिल्ली के आगे सारे कबूतर संघर्ष के अतिरिक्त कुछ ना कर पायें हों। कुछ आहट होने पर एक कबूतर को जीवित छोड़कर बिल्ली भाग गयी हो।

अब जो कुछ भी हुआ हो पर जो हो गया उसकी भरपाई सम्भव नही थी। जीवित बचे कबूतर पर हाथ रखा तो वो थोड़ा सिमट गया। बहुत अधिक डरा हुआ था। उसे नीचे उतारा और बाहर बालकनी मे रख दिया। थोड़ी देर के लिये वहीं छोड़ दिया उसे कुछ सामान्य होने के लिये। धीरे धीरे वो सामान्य हो रहा था। पैरों से थोडी चहल कदमी भी करने लगा। मैने उसके सामने अनाज के कुछ दाने और एक कटोरी पानी रख दिया पर उसने कुछ नही खाया। मैने सोचा उसे थोडी देर अकेला छोड़ दिया जाय तो मैं वहां से हट गया। थोडी देर बाद आकर देखा तो कबूतर वहां से जा चुका था।

तीनो मृत कबूतरों को बेहद दुखी हृदय से मैं एक तालाब पर रख आया। पूरी घटना का दुख कई दिनो तक बना रहा। दुख के साथ साथ एक अपराध बोध भी था। अब जब भी मैं छत पर जाता हूं तो ना चाहते हुये भी नजर अलमारी के उस हिस्से पर पड़ ही जाती है जहां उनका घोंसला था। थोड़ी देर के लिये मन असहज हो जाता है।

कई बार सोचा कि इस संस्मरण या लघुकथा को दुखांत ना रखें। पर सुखान्त होने की कोई गुंजाइश नही थी। दुख भी मानवीय अनुभूतियों का महत्वपूर्ण अंग है। संवेदनाओं मे संतुलन बना रहे इसलिये जीवन मे सुख और दुख दोनो की अनुभूति होती रहनी चाहिये। आवश्यक नही है कि कोई घटना अपने पर ही हो बल्कि किसी भी जीव पर हो दुख की अनुभूति तो होनी ही चाहिये। मुझे दुख के साथ एक अपराध बोध भी है।

रचनाकार : ब्रजेश श्रीवास्तव

(लेखक एक शिक्षक व वरिष्ठ साहित्यकार हैं)


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